मार्ग, इतिहास और एक अनुत्तरित रहस्य की कथा

प्रातःकाल का वह समय था जब सूर्य की पहली किरणें अभी-अभी पहाड़ियों को स्पर्श करने लगी थीं। वातावरण में एक अद्भुत शांति व्याप्त थी। गौतमेश्वर महादेव के मंदिर की घंटियों की ध्वनि अभी भी घाटी में गूँज रही थी। मंदिर परिसर में धूप और अगरबत्ती की सुगंध हवा में घुली हुई थी, और कहीं दूर से श्रद्धालुओं के मुख से निकलता “हर हर महादेव” का जयघोष सुनाई दे रहा था।
उसी पवित्र वातावरण में मैंने अपनी यात्रा आरम्भ की।
मेरे मन में एक ही विचार बार-बार उठ रहा था—पूर्णशिला महादेव।
यह स्थान मैंने कई बार सुना था। कहा जाता है कि यह स्थान घने वन के भीतर स्थित है, नगरों और राजमार्गों के शोर से दूर, प्रकृति की नीरवता में छिपा हुआ।
किन्तु इस स्थान के प्रति मेरी जिज्ञासा केवल मंदिर तक सीमित नहीं थी।
इस स्थान के साथ एक और रहस्य जुड़ा हुआ था।
यहाँ एक नव्वे वर्ष के वृद्ध संत निवास करते हैं, जो अनेक वर्षों से इसी स्थान पर तपस्या और साधना में लीन हैं।
यह विचार ही अपने-आप में अद्भुत था।
मन में अनेक प्रश्न उठते थे—
कौन हैं वे संत?
उन्होंने इतने वर्षों तक इस निर्जन स्थान को ही अपना निवास क्यों बनाया?
और क्या वे इस स्थान के इतिहास के साक्षी हैं?
इन विचारों के साथ मैंने अपनी मोटरसाइकिल आरम्भ की।
यह यात्रा पूरी तरह अकेली नहीं थी।
मेरे साथ मेरे एक अनुयायी अमित भी इस यात्रा में सम्मिलित हुए। वह लंबे समय से मेरी यात्राओं को देखता और सुनता आया था। जब उसे इस स्थान के विषय में ज्ञात हुआ, तो उसकी भी इच्छा हुई कि वह इस रहस्यमयी स्थान को स्वयं देखे।
हम दोनों ने यात्रा आरम्भ की।
प्रारम्भ में मार्ग अपेक्षाकृत सरल था। सड़क के दोनों ओर छोटे-छोटे गाँव दिखाई देते थे। कहीं खेत थे, कहीं मंदिर, और कहीं कुछ लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त दिखाई देते थे।
किन्तु धीरे-धीरे यह दृश्य बदलने लगा।
जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, वैसे-वैसे नगरों और गाँवों की चहल-पहल पीछे छूटती चली गई। सड़क संकरी होने लगी और उसके दोनों ओर ऊँची-ऊँची चट्टानें तथा पहाड़ियाँ दिखाई देने लगीं।
कुछ ही समय में ऐसा प्रतीत होने लगा मानो हम किसी और ही संसार में प्रवेश कर रहे हों।
कभी मार्ग समतल होता, तो कभी उबड़-खाबड़। कहीं सड़क चट्टानों के बीच से निकलती, तो कहीं घने वृक्षों की छाया उसे ढक लेती।
प्रत्येक किलोमीटर के साथ वातावरण और भी अधिक प्राचीन प्रतीत होने लगता था।
ऐसा लगता था मानो यह भूमि केवल वर्तमान की नहीं, बल्कि सहस्रों वर्षों की स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है।
कुछ समय तक निरंतर यात्रा करने के पश्चात हमने मार्ग में एक छोटे से ढाबे पर रुकने का निर्णय लिया।
वह स्थान अत्यंत साधारण था।
लकड़ी की एक छोटी-सी मेज, एक पुराना चूल्हा और उसके पास बैठा एक व्यक्ति, जो ताज़ा पकवान तैयार कर रहा था। वहाँ से उठती हुई तली हुई सामग्री की सुगंध वातावरण में फैल रही थी।
हमने वहाँ आलू वडा मँगवाया।
यात्रा के दौरान ऐसे छोटे-छोटे विश्राम स्थल ही अक्सर सबसे अधिक स्मरणीय बन जाते हैं।
हम दोनों एक ओर बैठ गए।
हाथ में चाय का कप था, सामने शांत मार्ग और दूर तक फैली पहाड़ियाँ।
क्षण भर के लिए लगा मानो समय भी कुछ देर के लिए ठहर गया हो।
किन्तु उस समय भी मेरा मन पूर्णशिला महादेव के विचारों में ही उलझा हुआ था।
बार-बार उसी स्थान की कल्पना मेरे मन में आती थी।
और उस वृद्ध संत की भी।
नव्वे वर्ष की आयु।
इतने वर्षों तक एक ही स्थान पर निवास।
वन की नीरवता में जीवन व्यतीत करना।
यह विचार अपने-आप में अत्यंत गूढ़ था।
किस प्रकार का जीवन होगा वह?
क्या वे संसार से पूर्णतः विरक्त हो चुके हैं?
क्या उनके पास ऐसे अनुभव और कथाएँ होंगी जो सामान्य जन कभी सुन भी नहीं पाते?
किन्तु मेरे मन में एक और विचार भी बार-बार उठ रहा था।
पूर्णशिला महादेव केवल एक साधु का निवास मात्र नहीं है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार इस स्थान का संबंध महाभारत काल से भी बताया जाता है।
कहा जाता है कि जब महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ, तब पाण्डव अत्यंत व्यथित और पश्चाताप से भरे हुए थे।
उस युद्ध में असंख्य योद्धाओं का वध हुआ था।
भले ही वह युद्ध धर्म की स्थापना के लिए लड़ा गया था, परन्तु उसके परिणामों ने पाण्डवों के हृदय को विचलित कर दिया था।
ऐसी स्थिति में उन्होंने भगवान शिव की खोज में अनेक तीर्थस्थलों की यात्रा की।
यह माना जाता है कि उसी यात्रा के दौरान वे अनेक निर्जन स्थानों में कुछ समय के लिए ठहरे थे।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि पूर्णशिला महादेव के समीप भी पाण्डव कुछ समय तक रहे थे।
जब मैं यह विचार करता था, तो मेरे सामने एक विचित्र चित्र उभरता था।
वही वन।
वही पहाड़ियाँ।
वही चट्टानें।
और सहस्रों वर्ष पूर्व, शायद उन्हीं मार्गों पर चलते हुए पाँच महान योद्धा।
यह विचार ही रोमांच उत्पन्न कर देता था।
समय कितना अद्भुत है।
राज्य बदलते हैं।
साम्राज्य समाप्त हो जाते हैं।
पीढ़ियाँ आती हैं और चली जाती हैं।
किन्तु भूमि वही रहती है।
वह सब कुछ देखती है।
सब कुछ अपने भीतर संजोकर रखती है।
हमारी यात्रा पुनः आरम्भ हुई।
अब मार्ग और अधिक कठिन होता जा रहा था।
कहीं-कहीं तो ऐसा प्रतीत होता था कि सड़क धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।
अंततः एक स्थान ऐसा आया जहाँ मोटरसाइकिल आगे नहीं जा सकती थी।
आगे केवल पथरीली भूमि थी।
चट्टानों और वृक्षों के बीच एक संकरा मार्ग दिखाई दे रहा था।
यही वह स्थान था जहाँ से आगे पैदल जाना था।
मेरे सामने वही स्थान था जिसके विषय में मैं इतने समय से सोच रहा था।
घने वृक्षों के बीच कहीं छिपा हुआ था—
पूर्णशिला महादेव।
और वहीं कहीं निवास करते थे—
वे रहस्यमयी वृद्ध संत।
हमने आगे बढ़ना प्रारम्भ किया।
प्रत्येक कदम के साथ एक विचित्र अनुभूति हो रही थी।
ऐसा लग रहा था मानो हम केवल एक स्थान की ओर नहीं, बल्कि किसी इतिहास की ओर बढ़ रहे हैं।
कुछ ही समय में हम उस स्थान पर पहुँच गए।
मेरे सामने वह स्थान था जिसके विषय में मैंने केवल सुना था।
किन्तु वास्तविक अनुभव कहीं अधिक गहरा था।
वहाँ की नीरवता, वहाँ का वातावरण, वहाँ की चट्टानें—सब कुछ एक अद्भुत अनुभूति प्रदान कर रहे थे।
मैं वहाँ पहुँच चुका था।
किन्तु मुझे यह भी ज्ञात था कि मेरी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।
वास्तव में तो अब उसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आरम्भ होने वाली थी।
क्योंकि अगला चरण था—
उस संत से मिलना।
उनसे वार्ता करना।
और संभवतः उन कथाओं को सुनना जो इस स्थान के रहस्य को और अधिक स्पष्ट कर सकें।
कौन जानते हैं—
शायद वे कथाएँ ऐसी हों जिन्हें बहुत कम लोगों ने सुना हो।
और शायद उन्हीं कथाओं में छिपा हो पूर्णशिला महादेव का वास्तविक इतिहास।
यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
(क्रमशः…)
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