स्वर्णमयी लंका…

जहाँ महलों की दीवारें सोने से चमकती थीं, पर हृदयों में अहंकार की आग जलती थी।
जहाँ शक्ति थी, पर शांति नहीं।
वैभव था, पर विनम्रता नहीं।
उसी लंका में एक ऐसा घर भी था जहाँ धर्म अब भी साँस ले रहा था।
वह घर था विभीषण का…
और उस घर की आत्मा थीं — सरमा।
राक्षसी कुल में जन्मी, पर हृदय से साध्वी
सरमा का उल्लेख हमें मुख्यतः रामायण के लंका कांड में मिलता है।
वह राक्षसी थीं — हाँ, यही उनकी पहचान थी संसार की दृष्टि में।
परंतु धर्म कभी जन्म से तय नहीं होता।
राक्षसों की नगरी में रहते हुए भी उनका मन करुणा से भरा था।
वे जानती थीं कि शक्ति यदि अधर्म के साथ खड़ी हो जाए, तो उसका अंत निश्चित है।
और जब उनके पति विभीषण ने सभा में खड़े होकर अपने ही भाई रावण को समझाया —
“भ्राता, सीता को लौटा दो। यही धर्म है। यही कल्याण है।”
तो वह केवल एक पुरुष की आवाज़ नहीं थी।
वह उस घर की सामूहिक साधना थी, जिसमें सरमा भी सहभागी थीं।
अशोक वाटिका – जहाँ करुणा ने धर्म को थामा
अशोक वाटिका की वह रात…
चाँदनी बिखरी हुई थी, पर वातावरण में निराशा घुली हुई थी।
वहाँ बैठी थीं सीता — अपमान, वियोग और अनिश्चितता के बीच।
रावण ने छल किया।
मायावी सिर दिखाकर सीता के हृदय को तोड़ना चाहा।
क्षण भर को प्रकृति भी जैसे स्तब्ध हो गई।
उसी प्रसंग में, जैसा कि रामायण के लंका कांड में वर्णित है, एक स्त्री आगे बढ़ती है।
वह धीरे से सीता के समीप आती है।
“माता, यह माया है। श्रीराम सुरक्षित हैं। आपका सत्य अटल है।”
वह थीं — सरमा।
कल्पना कीजिए उस क्षण को।
एक राक्षसी स्त्री, अपने ही राजा के विरुद्ध जाकर, बंदी बनाई गई एक पराई स्त्री को आश्वासन दे रही है।
यह केवल सहानुभूति नहीं थी।
यह धर्म के पक्ष में दिया गया मौन घोष था।
त्याग का निर्णय — जो इतिहास नहीं लिखता
जब रावण ने विभीषण का अपमान किया और उन्हें लंका से निकाल दिया,
तो वह क्षण केवल राजनीतिक नहीं था।
वह एक परिवार का विघटन था।
स्वर्ण महलों से निकलकर अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ना —
यह निर्णय आसान नहीं था।
क्या आपने कभी सोचा है, उस रात सरमा ने क्या महसूस किया होगा?
अपना घर, अपना नगर, अपना कुल… सब पीछे छोड़ देना।
पर उन्होंने रोका नहीं।
उन्होंने कहा नहीं — “रुको, यह हमारा घर है।”
उन्होंने केवल सत्य का हाथ थामा।
यही कारण है कि जब विभीषण ने श्रीराम का साथ चुना,
तो वह निर्णय अकेले का नहीं था।
वह उस दांपत्य का तप था।
रामचरितमानस में झलक
रामचरितमानस में भी लंका कांड के प्रसंगों में यह स्पष्ट है कि लंका में सभी हृदय कठोर नहीं थे।
तुलसीदास जी संकेत देते हैं कि अधर्म के बीच भी कुछ आत्माएँ प्रकाश की तरह चमकती हैं।
सरमा उसी प्रकाश की किरण हैं।
रावण का पतन और एक स्त्री की मौन विजय
जब रावण का अंत हुआ,
तो केवल एक युद्ध समाप्त नहीं हुआ —
अहंकार का युग समाप्त हुआ।
और जब विभीषण को लंका का राजतिलक मिला,
तो वह केवल राज्य परिवर्तन नहीं था।
वह उस स्त्री की भी विजय थी
जिसने अंधकार में विश्वास का दीपक जलाए रखा।
सरमा ने न शस्त्र उठाया,
न मंच से भाषण दिया,
न यश की कामना की।
उन्होंने केवल एक कार्य किया —
धर्म को टूटने नहीं दिया।
आज के लिए संदेश
हम अक्सर सोचते हैं कि इतिहास केवल वीरों को याद रखता है।
पर सत्य यह है — इतिहास को दिशा देने वाले अक्सर वे लोग होते हैं
जो परदे के पीछे खड़े होकर सत्य का साथ देते हैं।
सरमा हमें सिखाती हैं:
परिस्थिति चाहे कितनी भी अंधेरी हो, कुल चाहे कितना भी विपरीत हो, सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली हो —
यदि हृदय में धर्म है, तो आप अकेले नहीं हैं।
क्योंकि सत्य को तलवार से नहीं,
विश्वास से शक्ति मिलती है।
