माण्डवी : रामायण की भूली हुई निशब्द तपस्या

रामायण में जब भी त्याग की बात होती है,

हम राम को स्मरण करते हैं।

भ्रातृ-प्रेम की बात हो, तो भरत का नाम लिया जाता है।

पर क्या कभी किसी ने उस स्त्री को याद किया

जिसने भरत के साथ नहीं, भरत के त्याग के साथ जीवन बिताया?

वह थीं — माण्डवी।

🌸 

कौन थीं माण्डवी?

माण्डवी, मिथिला के राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री थीं।

सीता की छोटी बहन,

और भरत की पत्नी।

राजकुमारी होते हुए भी

उनका जीवन राजसी नहीं था —

वह संयम, प्रतीक्षा और मौन का जीवन था।

🪔 

भरत का त्याग — और माण्डवी का मौन

जब राम वन गए,

भरत ने राजसिंहासन ठुकरा दिया।

उन्होंने राम की खड़ाऊँ को ही राजा मान लिया।

इतिहास भरत के इस निर्णय को पूजता है।

पर इतिहास यह भूल जाता है कि—

👉 इस निर्णय की पहली साक्षी और सहभागी माण्डवी थीं।

  • वह चाहतीं तो रानी बन सकती थीं
  • चाहतीं तो प्रश्न कर सकती थीं
  • चाहतीं तो कह सकती थीं —
    “यह मेरा भी जीवन है”

पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

🌿 

राजमहल में नहीं, प्रतीक्षा में जीवन

माण्डवी ने न तो वनवास लिया,

न ही सिंहासन।

उन्होंने चुना —

  • तपस्विनी का जीवन
  • प्रतीक्षा का जीवन
  • ऐसा जीवन जिसमें कोई उत्सव नहीं,
    कोई विजय नहीं,
    केवल मर्यादा थी।

जब भरत नंदीग्राम में कुटिया बनाकर रहते थे,

माण्डवी भी उसी जीवन को अपनाती रहीं।

उनका त्याग दृश्य नहीं था,

इसलिए वह इतिहास में दर्ज नहीं हुआ।

🔥 

स्त्री का त्याग — जो शोर नहीं करता

रामायण की स्त्रियाँ रोती नहीं,

वे जलती हैं — भीतर।

सीता का दुःख दिखा,

उर्मिला का दुःख धीरे-धीरे पहचाना गया,

पर माण्डवी का दुःख?

वह तो इतना शांत था

कि किसी को सुनाई ही नहीं दिया।

🕊️ 

किसी ग्रंथ में उनका विलाप नहीं

रामायण में माण्डवी का कोई बड़ा संवाद नहीं।

कोई आक्रोश नहीं।

कोई शिकायत नहीं।

और शायद यही कारण है कि—

इतिहास ने उन्हें महत्व नहीं दिया।

क्योंकि इतिहास अक्सर

उन्हीं को याद रखता है

जो बोलते हैं,

न कि उन्हें

जो सहते हैं।

🌺 

माण्डवी — त्याग की अदृश्य धुरी

यदि भरत मर्यादा पुरुष थे,

तो माण्डवी मर्यादा की छाया थीं।

यदि भरत का त्याग आदर्श था,

तो माण्डवी का मौन आत्मबल था।

उनके बिना

भरत का निर्णय संभव नहीं था।

🪶 

आज भी कोई दीप नहीं जलता उनके नाम

आज भी—

  • उनके नाम पर कोई पर्व नहीं
  • कोई कथा नहीं
  • कोई स्मृति-दिवस नहीं

फिर भी, रामायण अधूरी है

यदि माण्डवी को भुला दिया जाए।

✨ 

समापन

“इतिहास ने राजाओं को याद रखा,

पर धर्म को जीवित रखने वाली स्त्रियों को नहीं।”

माण्डवी न रोईं,

न लड़ीं,

न प्रश्न उठाए।

उन्होंने बस

धर्म को टूटने नहीं दिया।

और शायद यही सबसे बड़ा बलिदान है।

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