देवी अनाहिता — वह शक्ति जिसे स्मरण नहीं किया गया

नवरात्रि का पहला दिन है।
मंदिरों में घंटियाँ बज रही हैं,
दीप जल रहे हैं,
और हर ओर “जय माता दी” की ध्वनि गूंज रही है।
लोग माँ दुर्गा के नौ रूपों का स्मरण कर रहे हैं—
शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा…
परंतु इन सबके बीच
एक नाम ऐसा भी है,
जो कभी लिया ही नहीं गया।
एक ऐसी देवी—
जो थी भी, और शायद अब भी है…
लेकिन जिसे हमने याद करना छोड़ दिया।
वह देवी जिसका कोई मंदिर नहीं
कहा जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में
जब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों को विभाजित किया,
तब एक शक्ति ऐसी भी थी
जिसे किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सका।
न वह केवल अग्नि थी,
न केवल वायु,
न ही केवल शक्ति।
वह थी—
अनाहिता।
एक ऐसी देवी
जिसका कोई स्थिर स्वरूप नहीं था।
ऋषियों की मौन कथा
कुछ प्राचीन ऋषियों के बारे में कहा जाता है
कि वे एक ऐसी शक्ति का ध्यान करते थे
जिसका कोई नाम नहीं था।
वे उसे “अनाहत नाद” की शक्ति कहते थे—
वह ध्वनि जो बिना किसी आघात के उत्पन्न होती है।
और उसी से निकला नाम—
अनाहिता।
कहा जाता है कि
जब ऋषि गहन ध्यान में जाते थे,
तो उन्हें एक स्त्री स्वरूप दिखाई देता था—
न पूरी तरह स्पष्ट,
न पूरी तरह अदृश्य।
वह जो प्रकट नहीं होती
अनाहिता की सबसे बड़ी विशेषता यही थी—
वह कभी पूर्ण रूप से प्रकट नहीं होती थी।
क्यों?
क्योंकि वह उन लोगों के लिए नहीं थी
जो केवल देखने पर विश्वास करते हैं।
वह केवल अनुभव करने वालों के लिए थी।
देवताओं का भी एक भय
कुछ पौराणिक कथाएँ यह संकेत देती हैं
कि देवता भी इस शक्ति से पूर्णतः परिचित नहीं थे।
कहा जाता है कि एक बार
जब देवताओं के बीच शक्ति के विभाजन की बात हुई,
तो एक ऋषि ने कहा—
“एक शक्ति ऐसी भी है,
जो किसी के अधीन नहीं है।”
उस समय
देवताओं ने उस विषय को आगे नहीं बढ़ाया।
क्योंकि—
जिसे नियंत्रित न किया जा सके,
उसका अस्तित्व स्वीकार करना कठिन होता है।
मनुष्यों ने क्यों भुला दिया?
समय बीतता गया।
मनुष्य ने देवताओं को रूपों में देखना शुरू किया—
मूर्तियों में, मंदिरों में, कथाओं में।
लेकिन अनाहिता…
वह किसी मूर्ति में समा नहीं सकी।
वह किसी कथा में सीमित नहीं हो सकी।
और धीरे-धीरे—
मनुष्य ने उसे भुला दिया।
एक विचित्र अनुभव
कुछ साधकों की कथाएँ आज भी सुनने को मिलती हैं—
वे कहते हैं कि
कभी-कभी ध्यान में
उन्हें एक ऐसी उपस्थिति महसूस होती है
जो न देवी है, न ऊर्जा…
बल्कि कुछ और है।
एक शांत, गहरी,
और अजीब तरह से परिचित उपस्थिति।
वे उसे नाम नहीं दे पाते।
लेकिन कुछ लोग
उसे आज भी एक ही नाम से पुकारते हैं—
अनाहिता।
क्या वह आज भी है?
यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।
क्या वह शक्ति वास्तव में थी?
या केवल एक कल्पना?
लेकिन एक बात निश्चित है—
हर उस स्थान पर,
जहाँ मन पूर्णतः शांत होता है,
जहाँ कोई विचार नहीं रहता…
वहाँ कुछ न कुछ अवश्य होता है।
नवरात्रि और अनाहिता
नवरात्रि केवल देवी की पूजा नहीं है—
यह स्वयं के भीतर झाँकने का समय है।
शायद यही कारण है कि
इस समय कुछ लोग
एक अजीब सी शांति महसूस करते हैं।
एक ऐसा भाव
जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
एक अंतिम विचार
अगर आप आज नवरात्रि के पहले दिन
माँ का स्मरण कर रहे हैं,
तो एक बार
उस शक्ति को भी याद करें—
जिसका कोई नाम नहीं,
कोई रूप नहीं,
कोई मंदिर नहीं।
क्योंकि…
हो सकता है
कि वही शक्ति
सबसे पहले थी।
और हो सकता है—
वही शक्ति
अब भी आपके भीतर कहीं मौन बैठी हो।
समापन
नवरात्रि के इस पावन अवसर पर
जब आप दीप जलाएँ,
जब आप माँ का नाम लें—
तो एक क्षण के लिए
अपनी आँखें बंद करें…
और उस मौन को सुनें
जो शब्दों से परे है।
शायद—
वहीं कहीं
आपको मिल जाए…
वह देवी,
जिसे दुनिया ने भुला दिया।
जय माता दी 🙏
