छठी की रहस्यमयी देवी: जिसे हम पूजते हैं, पर पहचानते नहीं

भारत के अनेक घरों में बच्चे के जन्म के छठे दिन एक विशेष पूजा होती है। इसे कहीं “छठी”, कहीं “छठियार”, तो कहीं “शष्ठी पूजन” कहा जाता है। उस दिन घर में दीपक जलाया जाता है, चावल या फल रखे जाते हैं, बच्चे के पास कागज़-कलम रख दी जाती है, और परिवार के लोग धीरे-धीरे आशीर्वाद देते हैं।

लेकिन यदि आज किसी से पूछा जाए — “यह छठी क्यों मनाते हैं?” — तो अक्सर उत्तर मिलता है:

“हमारे यहाँ परंपरा है।”

“बच्चे की किस्मत लिखी जाती है।”

“बुजुर्गों से चला आ रहा है।”

परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे एक प्राचीन देवी हैं — शष्ठी देवी।

“शष्ठी” का अर्थ और महत्व

“शष्ठी” का शाब्दिक अर्थ है — “छठी”। हिंदू पंचांग के अनुसार शुक्ल पक्ष की छठी तिथि को शष्ठी कहा जाता है। किंतु जन्म के बाद छठे दिन की पूजा का विशेष संबंध इसी देवी से माना गया है।

लोकविश्वास के अनुसार, जन्म के छठे दिन रात्रि में शष्ठी देवी आती हैं और नवजात शिशु का भाग्य लिखती हैं। इसी कारण कई घरों में उस रात दीपक जलाकर रखा जाता है और बच्चे के सिरहाने कागज़-कलम रखी जाती है — यह प्रतीक है कि देवी उसके जीवन की रेखाएँ अंकित करेंगी।

आज यह केवल एक रस्म बन गई है, पर इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अर्थ छिपा है।

शास्त्रीय संदर्भ

शष्ठी देवी का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है।

📜 स्कंद पुराण में उन्हें बालकों की रक्षिका और संतानदात्री देवी के रूप में वर्णित किया गया है।

कुछ परंपराओं में उन्हें भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता-स्वरूपा या शक्ति का अंश भी माना गया है।

वेदों में प्रत्यक्ष रूप से शष्ठी का नाम कम मिलता है, परंतु मातृका-पूजन और बाल-सुरक्षा से जुड़े कई संकेत मिलते हैं। बाद के पुराणों और लोककथाओं में उनका स्वरूप अधिक स्पष्ट होता गया।

बिल्ली उनका वाहन क्यों?

शष्ठी देवी को अक्सर बिल्ली पर आरूढ़ दिखाया जाता है। लोककथाओं में कहा गया है कि यदि कोई बिल्ली को हानि पहुँचाता है तो देवी अप्रसन्न हो सकती हैं।

एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक स्त्री ने बिल्ली को सताया। परिणामस्वरूप उसके बच्चे गायब होने लगे। जब उसने पश्चाताप कर देवी की आराधना की, तब बच्चे सुरक्षित लौट आए। यह कथा प्रतीकात्मक है — यह सिखाती है कि मातृत्व, करुणा और जीवों के प्रति दया आवश्यक है।

ग्रामीण समाज में बिल्ली अनाज की रक्षा करती थी, जो परिवार के जीवन का आधार था। इस प्रकार बिल्ली और मातृत्व दोनों सुरक्षा के प्रतीक थे।

छठी की रात — भाग्य लेखन की परंपरा

भारतीय दर्शन में कर्म और भाग्य का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। जन्म के साथ ही जीवन का एक मार्ग निर्धारित माना जाता है। छठी का संस्कार इस दार्शनिक विचार का लोक रूप है।

जब परिवार दीपक जलाता है, तो वह केवल अंधकार दूर करने के लिए नहीं — बल्कि आशा और सुरक्षा के लिए भी जलाया जाता है।

जब बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं, तो वे केवल शब्द नहीं — एक पीढ़ी का अनुभव अगली पीढ़ी को सौंपते हैं।

यह रस्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन की अनिश्चितता के सामने एक सामूहिक प्रार्थना है।

सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू

प्राचीन समय में प्रसव अत्यंत जोखिमपूर्ण था। शिशु मृत्यु दर अधिक थी। ऐसे समय में छठी का संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समर्थन का माध्यम भी था।

माँ को भावनात्मक सहारा मिलता था। परिवार एकत्र होता था। शिशु को औपचारिक रूप से समाज में स्वीकार किया जाता था।

आज चिकित्सा विज्ञान उन्नत है, परंतु उस समय आस्था ही सुरक्षा का आधार थी।

क्यों हुईं “भुला दी गई” देवी?

समय के साथ शिव, विष्णु, दुर्गा जैसे प्रमुख देवताओं की उपासना व्यापक हुई। भक्ति आंदोलन और विशाल मंदिर परंपराओं ने कुछ देवताओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया।

शष्ठी देवी की पूजा अधिकतर घरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित रही। वे मंदिरों की नहीं, घरों की देवी थीं।

शहरों में आधुनिक जीवनशैली के साथ लोकपरंपराएँ धुंधली होती गईं। पूजा तो बची रही, पर कथा पीछे छूट गई।

आज के संदर्भ में महत्व

आज जब हम छठी मनाते हैं, तो शायद हमें यह ज्ञात नहीं होता कि हम एक प्राचीन मातृशक्ति का स्मरण कर रहे हैं।

यह संस्कार हमें याद दिलाता है:

जीवन नाजुक है। हर जन्म एक चमत्कार है। परिवार और समुदाय का सहयोग अनिवार्य है।

छठी केवल भाग्य लेखन की कथा नहीं — यह जीवन के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।

निष्कर्ष

शष्ठी देवी भले ही भव्य मंदिरों में स्थापित न हों, पर वे हर उस घर में उपस्थित हैं जहाँ छठे दिन दीपक जलाया जाता है।

हम पूजा तो करते हैं, पर कारण भूल चुके हैं।

हम रस्म निभाते हैं, पर कथा नहीं जानते।

यदि हम इस परंपरा के पीछे की भावना को समझ लें, तो छठी का दीपक केवल परंपरा नहीं रहेगा — वह ज्ञान, कृतज्ञता और मातृत्व की ज्योति बन जाएगा।

और एक सुंदर लोकविश्वास यह भी कहता है कि जो व्यक्ति शष्ठी देवी की कथा सुनता है, सुनाता है या साझा करता है — उसके बच्चों पर देवी की विशेष कृपा बनी रहती है।

इसलिए यदि यह लेख आपके हृदय को छू जाए, तो इसे साझा कीजिए।

क्योंकि शायद किसी घर में जलता हुआ अगला दीपक,

शष्ठी देवी के आशीर्वाद से और भी उज्ज्वल हो जाए। 

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