अंगद का जन्म गर्जना के घर में हुआ था।

उसके पिता थे बालि—
वनों का सिंह, युद्ध का देवता।
पर अंगद का स्वभाव पिता जैसा उग्र नहीं था।
वह शांत था,
गंभीर था,
और भीतर से करुणा से भरा हुआ।
पिता की मृत्यु — और धर्म की पहली परीक्षा
जब बालि युद्धभूमि में गिरे,
तो अंगद का हृदय भी वहीं गिर पड़ा।
पर उसने रोष नहीं चुना।
उसने प्रतिशोध नहीं चुना।
उसने अपने आँसुओं को दबाकर
राम के चरणों में
अपना मस्तक झुका दिया।
क्योंकि अंगद समझ गया था—
धर्म व्यक्तिगत पीड़ा से बड़ा होता है।
उस दिन अंगद ने
पिता को खोया,
पर राम को पाया।
राम के प्रति प्रेम — मौन लेकिन अडिग
अंगद राम के पीछे नहीं चला
क्योंकि उन्हें शक्ति चाहिए थी—
वह उनके साथ चला
क्योंकि वे धर्म थे।
राम जब बोलते थे,
अंगद सुनता था।
राम जब निर्णय लेते थे,
अंगद स्वीकार करता था।
उसने कभी प्रश्न नहीं किया—
क्योंकि उसका विश्वास प्रश्नों से आगे था।
रावण की सभा में — अहंकार नहीं, मर्यादा
जब अंगद रावण की सभा में पहुँचा,
तो वह क्रोध लेकर नहीं गया।
वह राम का संदेश लेकर गया—
शांति का,
मर्यादा का,
अंतिम अवसर का।
उसने जब अपना पाँव जमाया,
तो वह शक्ति का प्रदर्शन नहीं था—
वह यह संकेत था कि
राम का धर्म अडिग है।
अंगद युद्ध चाहता तो
उस दिन लंका जल सकती थी,
पर उसने संयम चुना—
क्योंकि यही राम की शिक्षा थी।
युद्ध में — नाम नहीं, निष्ठा
लंकायुद्ध में अंगद लड़ा।
बहुत लड़ा।
पर उसने कभी
अपने पराक्रम का ढोल नहीं पीटा।
वह जानता था—
राम के युद्ध में
नाम नहीं,
कर्तव्य महत्त्वपूर्ण है।
भुला दिया गया — फिर भी शिकायत नहीं
युग बीते।
कथाएँ कही गईं।
कुछ नाम अमर हुए।
कुछ छूट गए।
अंगद का नाम
पीछे रह गया—
पर अंगद को इससे पीड़ा नहीं हुई।
क्योंकि उसके लिए
सबसे बड़ा सम्मान यही था कि—
“मैं राम के साथ था,
और वही पर्याप्त है।”
अंगद का सत्य
अंगद विद्रोही नहीं था।
वह त्यागी था।
वह शोक में डूबा था,
पर भक्ति में स्थिर।
और शायद इसीलिए
वह आज भी हमें सिखाता है—
सच्चा प्रेम
शोर नहीं करता,
वह चुपचाप निभाया जाता है।
